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राजनीतिक दलों का वंशवाद युवाओं के मौके खा रहा है!?

इसमें   कोई शक नहीं  है कि भारतीय  युवा पूरे विश्व में अपनी काबिलियत का लोहा  मनवा चुके हैं और जिस तेजी से हम अपने देश की तरक्की का सपना देख रहे हैं, उसमे हमारी युवा पीढ़ी हर क्षेत्र में सफलता के नए आयामों को छू रही है। इन सबके बीच एक सवाल यह है कि क्या व्यक्तिगत विकास और खुद को सेपरेट रखने की सोच एक स्वस्थ्य समाज का निर्माण कर सकेंगी? समाज की ज़रूरतों और मुसीबतों को जनता की आवाज़ बनकर सत्तानशी तक पहुंचने की ज़िम्मेदारी भी अब युवाओं को अपने जवान कंधे पर रखनी होगी। विश्व की सबसे विशाल लोकतंत्र की आधी से अधिक आबादी के रगों में जब जवान लहू की वेग दौड़ती हो, तब यह लाज़मी है कि उनका प्रतिनिधित्व भी उनमें से ही कोई करे। राजनीति की परिभाषा लोग अपनी समझ के अनुसार गढ़ते हैं मगर वास्तविकता कुछ और कहती है।राजनीति राष्ट्रीय व्यवस्था एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को सुचारू व सुगम बनाने की प्रणाली है। इसके अपने मूल्य एवं नीतियां हैं, जो सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय के उच्च आदर्शों से ओत-प्रोत है। इसे विडंबना ही कह सकते हैं कि आज़ाद भारत में जयप्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन के बाद...
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जानें, क्या है रिवेंज पॉर्न और कैसे इससे बचें

आए दिन आपको खबरें पढ़ने और सुनने को मिलती होंगी कि फलां जगह पर एक लड़के ने लड़की के मुंह पर ऐसिड डाला या किसी ने अपनी गर्लफ्रेंड की पर्सनल फोटो इंटरनेट में डाली। इसे कहते हैं रिवेंज पॉर्न। जब कोई अपने पार्टनर से बदला लेने के लिए किसी भी हद तक चला जाए, इसी को ही कहते हैं रिवेंज पॉर्न। इन दिनों बदला लेने की यह प्रवृति बेहद कॉमन होती जा रही है। बदला लेने के लिए कुछ लड़के-लड़कियों पर कई तरह से हमला करते हैं। ऐसिड अटैक, कत्ल या फिर उनका करैक्टर हनन के कई मामले आपने सुने होंगे, लेकिन इंटरनेट के युग में एक और शब्द प्रचलन में है जिसे 'रिवेंज पॉर्न' कहते हैं। इसमें बदला लेने की प्रवृति इस कदर हावी रहती है कि व्यक्ति बदला लेने के लिए किसी भी हद तक गिर जाता है। क्या है 'रिवेंज पॉर्न' अपने एक्स पार्टनर से बदला लेने के लिए अगर आप कोई घिनौना और घटिया रास्ता अपनाता है, तो उसे कहा जाता है रिवेंज पॉर्न। इसमें बदला लेने का जूनून व्यक्ति में इस कदर हावी रहता है कि वह उस हद तक चला जाता है कि जितना घटिया चीज वह अपने पार्टनर के लिए कर सकता है, करता है। इसमें उसका मकसद उसे अधिक से अधिक हर्...

मेरी पटना यात्रा और पटना का इतिहास!!

 हम तो आईना हैं दिखायेगें दाग चेहरे का ! जिसे बुरा लगे सामने से हट जाएं !! बिहार की राजधानी पटना प्राचीन काल से ही सत्ता का केंद्र रही है. समय-समय पर इसके नाम बदलते रहे हैं. मसलन, पाटलिपुत्र, पाटलिपट्टन, पाटलिग्राम, कुसुमपुर, पुष्पपुर, अजीमाबाद आदि. गंगा, गंडक और सोन नदी के संगम पर अवस्थित इस ऐतिहासिक नगर को हर्यक वंश के राजा अजातशत्रु द्वारा पांचवीं ई.पू. में बसाया गया था. उस समय इस शहर की लंबाई एवं चौड़ाई महज 14 व 3 किलोमीटर थी. पूरा शहर खाईयों व दीवारों से घिरा हुआ था. दीवारों में जगह-जगह टावर एवं गेट बने हुए थे. इनकी संख्या क्रमशः 570 और 64 थी. विदित हो कि इस शहर का विकास सैनिक शिविर के रूप में किया गया, क्योंकि मगध शुरू से ही सत्ता का केंद्र रहा था. मगध की गद्दी पर बैठना फक्र की बात समझी जाती थी. इस क्रम में वज्जी और लिच्छवी हमेशा रेस में आगे रहते थे. कालांतर में जब मगध का विस्त्तार हुआ तथा धीरे-धीरे आर्थिक, राजनीतिक तथा सामरिक परिप्रेक्ष्य में राजगृह का महत्व घटने लगा, तब पाटलिपुत्र स्वभाविक रूप से राजगृह का विकल्प बनकर उभरा. बदले सामरिक महत्व को मद्देनजर रखते हुए आजात...

नशा और युवा!

नशा कोई भी हो, वह हमारी सेहत के लिए खतरनाक है। आज देश ही नहीं दुनियाभर के युवा बड़ी तेजी से नशे (drug) की गिरफ्त में फंसते जा रहे हैं। इससे न सिर्फ उनका करियर और जीवन बर्बाद होता है बल्कि परिवार, समाज और देश का भी नुकसान होता है। ऐसे में युवाओं को इस लत से रोकने के लिए जरूरी है कि उनके माता-पिता और अभिभावकों को इस बात की जानकारी दी जाए कि कौन से ऐसे कारक हैं जिसकी वजह से उनके बच्चे नशे की राह पर जा सकते हैं।  आइए समझते हैं कि कोई भी नशा क्यों करता है या रिस्क फैक्टर्स कौन से हैं। आसपास का माहौल अगर युवाओं के आसपास का माहौल ऐसा है जहां ड्रग्स आसानी से उपलब्ध है। इलाके में गरीबी है या फिर दोस्त ड्रग्स (drugs) लेते हैं। इसके अलावा अगर दोस्त किसी कानूनी पचड़े में फंस गए हैं तो संबंधित युवक के ड्रग्स लेने की आशंका ज्यादा रहती है। हालांकि अगर युवक के आसपास के दोस्त अच्छे हों और वह किसी ऐसे व्यक्ति को अपना रोल मॉडल (roll model) बनाता है जो आज बड़े मुकाम पर पहुंच चुका हो तो उसके नशे से दूर रहने की संभावना बढ़ जाती है। कम उम्र की संगत अगर युवक कम उम्र में ही स्मोकिंग (...

कन्हैया भैया चुड़ियाँ श्रृंगार का प्रतीक है ना कि कमजोरी की!

कन्हैया कुमार. कम्युनिस्ट पार्टी इंडिया के नेता. पूर्व JNU छात्र. इंडिया टुडे के पोर्टल पर एक डिबेट में आए. अमिताभ सिन्हा के साथ बहस चल रही थी. अमिताभ बीजेपी के स्पोक्सपर्सन हैं. लॉयर हैं. JNU से ही पढ़े हैं. राजदीप सरदेसाई इस डिबेट को मॉडरेट कर रहे थे. इस बहस के दौरान अमिताभ सिन्हा ने कन्हैया से कहा कि तियानानमेन स्क्वायर के बारे में उन्हें नहीं पता होगा क्योंकि वो बच्चे थे. इसके जवाब में कन्हैया ने कहा, जब 2010 में 76 CRPF जवानों  की हत्या के खिलाफ प्रोटेस्ट चल रहा था, तब आप क्या कर रहे थे? चूड़ी पहन लिए थे? https://youtu.be/NIiEvi57Bek वीडियो आप यहां देख सकते हैं. चूड़ियों वाली बात आप 11 मिनट 40 सेकण्ड पर सुन सकते हैं: चूड़ी ही क्यों? चूड़ियां पहन लेना मुहावरा है. यानी ‘स्त्री जैसी असमर्थता दिखाना’. किसी मर्द को ताना देना हो कि वो नालायक है, या उसमें हिम्मत नहीं है, तो उसे कह दिया जाता है कि उसने चूड़ियां पहन रखी हैं. कई बार औरतें भी धरना प्रदर्शन करने बैठती हैं तो नेताओं को चूड़ियां भेज देती हैं. प्रतीकात्मकता यही है कि जिसने चूड़ियां पहनी हैं, वो ‘मर्द’ नहीं हैं. नाज़ुक ...

बेगूसराय (रामदीरी) में बूथ कैप्चरिंग की पहली घटना हुई थी, उसी बेगूसराय से थे बाहुबली कामदेव सिंह…..

आजाद भारत में जब 1951-52 में पहली बार चुनाव हुए उसी समय से बिहार में वर्चस्व के बलबूते चुनाव जीतने का सिलसिला शुरू हुआ। हालांकि 1952 के चुनाव में ज्यादातर ऐसे लोग जीते जो स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे या जो जमींदार रहे या जमींदारों के खिलाफ आवाज उठाए। आज के दौर में बिहार में अपराधियों का राजनीतिकरण अपने चरम पर पहुंच चुका है। हर दल ने हर जाति के अपराधियों को अपनी जरुरत के हिसाब से खूब पालपोस कर रखा है। 1957 के लोकसभा चुनाव से ही बाहुबल के बलबूते बिहार में चुनाव जीतने की शुरूआत हुई थी। देश को बूथ लूटने का रास्ता भी बिहार ने दिखाया।उसी बेगूसराय ने 1957 में देश में बूथ लूट की पहली घटना के कारण सुर्खियां बटोरी थी। हालांकि इतिहास यह भी कहता है कि उसी दौर में आंध्रप्रदेश के कुछ इलाकों में भी बूथ कब्जा करना की घटना हुई थी लेकिन बूथ लूट का पहला मामला बेगूसराय से ही जुड़ा रहा। कहते हैं, बिहार में पहली बार बूथ लूटने की घटना पुराने मुंगेर और वर्तमान बेगूसराय के रामदीरी गाँव में हुई थी। वह भी साल 1957 में। तब रचियाही गांव के कछारी टोला में सरयुग प्रसाद सिंह के लिए बूथ कैप्चरिंग हुआ। वह द...

मेरा घर:-" बेगूसराय"

बेगूसराय मेरा घर है, आज कल वहां जो हालात हो गये है वो देख कर दिल दहल जाता है। कितना बदल गया है, शहर बदला सो बदला लोग कितना बदल गये। हर‌ तरफ खून खराबा, चोरी, बेईमानी , कोई किसी के घर पर तो कोई जमीन पर कब्जा कर रहा, इंसानियत मरते जा रही वहां के लोगों में..ऐसा नहीं है कि सब वैसे ही है लेकिन जितना भी है वो बेगुसराय जिले की आवोहवा बदल कर रख दिए। इधर 3-4 साल‌ में जितना खून खराबा हुआ है, लगता है बेगुसराय भी पाकिस्तान, सीरिया, अफगानिस्तान ना बन जाए। कमाने वाले काम कर मर रहे और जिनको मुफ्त का खाना है वो मार रहे। एक दूसरे को लूटने की फिराक में रहते जिस कारण  वो किसी का भी खून करने में पीछे नहीं रहते और उनकी आने वाली पीढ़ी भी वही सीख रही, बाप 20 बरस काट कर आया तो‌ बेटा सोचता हम क्यों पीछे रहे.. हमारा बेगुसराय तो कितना शांत हुआ करता था। लोग अपने काम में मस्त, किसानी में मस्त एक दूसरे कि मदद को तैयार फिर क्या‌ हो गया। लोग आगे बढना चाह रहे ये पीछे जा रहा....  आइए पहले पुराने बेगुसराय से मिले...        बेगूसराय-   यह 1972 में बना, पहले तो मुंगेर जिले के उ...