इसमें कोई शक नहीं है कि भारतीय युवा पूरे विश्व में अपनी काबिलियत का लोहा मनवा चुके हैं और जिस तेजी से हम अपने देश की तरक्की का सपना देख रहे हैं, उसमे हमारी युवा पीढ़ी हर क्षेत्र में सफलता के नए आयामों को छू रही है। इन सबके बीच एक सवाल यह है कि क्या व्यक्तिगत विकास और खुद को सेपरेट रखने की सोच एक स्वस्थ्य समाज का निर्माण कर सकेंगी? समाज की ज़रूरतों और मुसीबतों को जनता की आवाज़ बनकर सत्तानशी तक पहुंचने की ज़िम्मेदारी भी अब युवाओं को अपने जवान कंधे पर रखनी होगी। विश्व की सबसे विशाल लोकतंत्र की आधी से अधिक आबादी के रगों में जब जवान लहू की वेग दौड़ती हो, तब यह लाज़मी है कि उनका प्रतिनिधित्व भी उनमें से ही कोई करे। राजनीति की परिभाषा लोग अपनी समझ के अनुसार गढ़ते हैं मगर वास्तविकता कुछ और कहती है।राजनीति राष्ट्रीय व्यवस्था एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को सुचारू व सुगम बनाने की प्रणाली है। इसके अपने मूल्य एवं नीतियां हैं, जो सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय के उच्च आदर्शों से ओत-प्रोत है। इसे विडंबना ही कह सकते हैं कि आज़ाद भारत में जयप्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन के बाद...