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Showing posts from January, 2020

नशा और युवा!

नशा कोई भी हो, वह हमारी सेहत के लिए खतरनाक है। आज देश ही नहीं दुनियाभर के युवा बड़ी तेजी से नशे (drug) की गिरफ्त में फंसते जा रहे हैं। इससे न सिर्फ उनका करियर और जीवन बर्बाद होता है बल्कि परिवार, समाज और देश का भी नुकसान होता है। ऐसे में युवाओं को इस लत से रोकने के लिए जरूरी है कि उनके माता-पिता और अभिभावकों को इस बात की जानकारी दी जाए कि कौन से ऐसे कारक हैं जिसकी वजह से उनके बच्चे नशे की राह पर जा सकते हैं।  आइए समझते हैं कि कोई भी नशा क्यों करता है या रिस्क फैक्टर्स कौन से हैं। आसपास का माहौल अगर युवाओं के आसपास का माहौल ऐसा है जहां ड्रग्स आसानी से उपलब्ध है। इलाके में गरीबी है या फिर दोस्त ड्रग्स (drugs) लेते हैं। इसके अलावा अगर दोस्त किसी कानूनी पचड़े में फंस गए हैं तो संबंधित युवक के ड्रग्स लेने की आशंका ज्यादा रहती है। हालांकि अगर युवक के आसपास के दोस्त अच्छे हों और वह किसी ऐसे व्यक्ति को अपना रोल मॉडल (roll model) बनाता है जो आज बड़े मुकाम पर पहुंच चुका हो तो उसके नशे से दूर रहने की संभावना बढ़ जाती है। कम उम्र की संगत अगर युवक कम उम्र में ही स्मोकिंग (...

कन्हैया भैया चुड़ियाँ श्रृंगार का प्रतीक है ना कि कमजोरी की!

कन्हैया कुमार. कम्युनिस्ट पार्टी इंडिया के नेता. पूर्व JNU छात्र. इंडिया टुडे के पोर्टल पर एक डिबेट में आए. अमिताभ सिन्हा के साथ बहस चल रही थी. अमिताभ बीजेपी के स्पोक्सपर्सन हैं. लॉयर हैं. JNU से ही पढ़े हैं. राजदीप सरदेसाई इस डिबेट को मॉडरेट कर रहे थे. इस बहस के दौरान अमिताभ सिन्हा ने कन्हैया से कहा कि तियानानमेन स्क्वायर के बारे में उन्हें नहीं पता होगा क्योंकि वो बच्चे थे. इसके जवाब में कन्हैया ने कहा, जब 2010 में 76 CRPF जवानों  की हत्या के खिलाफ प्रोटेस्ट चल रहा था, तब आप क्या कर रहे थे? चूड़ी पहन लिए थे? https://youtu.be/NIiEvi57Bek वीडियो आप यहां देख सकते हैं. चूड़ियों वाली बात आप 11 मिनट 40 सेकण्ड पर सुन सकते हैं: चूड़ी ही क्यों? चूड़ियां पहन लेना मुहावरा है. यानी ‘स्त्री जैसी असमर्थता दिखाना’. किसी मर्द को ताना देना हो कि वो नालायक है, या उसमें हिम्मत नहीं है, तो उसे कह दिया जाता है कि उसने चूड़ियां पहन रखी हैं. कई बार औरतें भी धरना प्रदर्शन करने बैठती हैं तो नेताओं को चूड़ियां भेज देती हैं. प्रतीकात्मकता यही है कि जिसने चूड़ियां पहनी हैं, वो ‘मर्द’ नहीं हैं. नाज़ुक ...

बेगूसराय (रामदीरी) में बूथ कैप्चरिंग की पहली घटना हुई थी, उसी बेगूसराय से थे बाहुबली कामदेव सिंह…..

आजाद भारत में जब 1951-52 में पहली बार चुनाव हुए उसी समय से बिहार में वर्चस्व के बलबूते चुनाव जीतने का सिलसिला शुरू हुआ। हालांकि 1952 के चुनाव में ज्यादातर ऐसे लोग जीते जो स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे या जो जमींदार रहे या जमींदारों के खिलाफ आवाज उठाए। आज के दौर में बिहार में अपराधियों का राजनीतिकरण अपने चरम पर पहुंच चुका है। हर दल ने हर जाति के अपराधियों को अपनी जरुरत के हिसाब से खूब पालपोस कर रखा है। 1957 के लोकसभा चुनाव से ही बाहुबल के बलबूते बिहार में चुनाव जीतने की शुरूआत हुई थी। देश को बूथ लूटने का रास्ता भी बिहार ने दिखाया।उसी बेगूसराय ने 1957 में देश में बूथ लूट की पहली घटना के कारण सुर्खियां बटोरी थी। हालांकि इतिहास यह भी कहता है कि उसी दौर में आंध्रप्रदेश के कुछ इलाकों में भी बूथ कब्जा करना की घटना हुई थी लेकिन बूथ लूट का पहला मामला बेगूसराय से ही जुड़ा रहा। कहते हैं, बिहार में पहली बार बूथ लूटने की घटना पुराने मुंगेर और वर्तमान बेगूसराय के रामदीरी गाँव में हुई थी। वह भी साल 1957 में। तब रचियाही गांव के कछारी टोला में सरयुग प्रसाद सिंह के लिए बूथ कैप्चरिंग हुआ। वह द...

मेरा घर:-" बेगूसराय"

बेगूसराय मेरा घर है, आज कल वहां जो हालात हो गये है वो देख कर दिल दहल जाता है। कितना बदल गया है, शहर बदला सो बदला लोग कितना बदल गये। हर‌ तरफ खून खराबा, चोरी, बेईमानी , कोई किसी के घर पर तो कोई जमीन पर कब्जा कर रहा, इंसानियत मरते जा रही वहां के लोगों में..ऐसा नहीं है कि सब वैसे ही है लेकिन जितना भी है वो बेगुसराय जिले की आवोहवा बदल कर रख दिए। इधर 3-4 साल‌ में जितना खून खराबा हुआ है, लगता है बेगुसराय भी पाकिस्तान, सीरिया, अफगानिस्तान ना बन जाए। कमाने वाले काम कर मर रहे और जिनको मुफ्त का खाना है वो मार रहे। एक दूसरे को लूटने की फिराक में रहते जिस कारण  वो किसी का भी खून करने में पीछे नहीं रहते और उनकी आने वाली पीढ़ी भी वही सीख रही, बाप 20 बरस काट कर आया तो‌ बेटा सोचता हम क्यों पीछे रहे.. हमारा बेगुसराय तो कितना शांत हुआ करता था। लोग अपने काम में मस्त, किसानी में मस्त एक दूसरे कि मदद को तैयार फिर क्या‌ हो गया। लोग आगे बढना चाह रहे ये पीछे जा रहा....  आइए पहले पुराने बेगुसराय से मिले...        बेगूसराय-   यह 1972 में बना, पहले तो मुंगेर जिले के उ...

"छपाक से पहचान ले गया "(तबस्‍सुम की कहानी)

लिखी थी किस्‍मत में जो भी खुशियां, तेजाब ने सब जला दिया, छुपाए फिरती हूं अपना चेहरा कि जैसे कोई गुनाह किेया है. मेरी समझ में नहीं है आता न जाने कैसा ये माजरा है, डरी हुई हूं मैं आईने से या आईने को डरा दिया है. हमारी दुनिया में है अंधेरा हमें नहीं है मलाल उसका, चिराग दिल का बुझा के हमने चिराग दिल का जला दिया है. है हुक्‍म मौला सब्र करने के सब्र का फल अजीज होगा, लिहाजा टूबा ने ख्‍वाहिशों को थपक-थपक कर सुला दिया है. तू जीतकर भी न जीत पाया... मैं हारकर भी न हार पाया. बेशक ये पढ़कर नाउम्‍मीद के अंधेरे में उम्‍मीद की रोशनी जागती है, ऐसी ही एक रोशनी है टूबा तबस्‍सुम. उनके जीवन में मुसीबतों के कई पहाड़ टूटे लेकिन इनका सामना करते हुए उन्‍होंने अपनी मंजिल को पाया या कहें आज भी उनका संघर्ष बिना जारी है. वे एसिड अटैक की मार झेल चुकी हैं, जिसके बाद भी उन्‍होंने हाल ही बिहार बोर्ड से 12वीं बोर्ड एग्‍जाम में 70 फीसदी नंबर हासिल किए हैं. कौन है टूबा तबस्‍सुम: ये नाम आज इसलिए खास है क्‍योंकि उन्‍हें मिटाने के लिए मनचलों ने उनपर तेजाब फेका. तेजाब गिरने से बेशक उनका चेहरा पिघल गया लेकिन ...