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बेगूसराय (रामदीरी) में बूथ कैप्चरिंग की पहली घटना हुई थी, उसी बेगूसराय से थे बाहुबली कामदेव सिंह…..

आजाद भारत में जब 1951-52 में पहली बार चुनाव हुए उसी समय से बिहार में वर्चस्व के बलबूते चुनाव जीतने का सिलसिला शुरू हुआ। हालांकि 1952 के चुनाव में ज्यादातर ऐसे लोग जीते जो स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे या जो जमींदार रहे या जमींदारों के खिलाफ आवाज उठाए।
आज के दौर में बिहार में अपराधियों का राजनीतिकरण अपने चरम पर पहुंच चुका है। हर दल ने हर जाति के अपराधियों को अपनी जरुरत के हिसाब से खूब पालपोस कर रखा है। 1957 के लोकसभा चुनाव से ही बाहुबल के बलबूते बिहार में चुनाव जीतने की शुरूआत हुई थी। देश को बूथ लूटने का रास्ता भी बिहार ने दिखाया।उसी बेगूसराय ने 1957 में देश में बूथ लूट की पहली घटना के कारण सुर्खियां बटोरी थी। हालांकि इतिहास यह भी कहता है कि उसी दौर में आंध्रप्रदेश के कुछ इलाकों में भी बूथ कब्जा करना की घटना हुई थी लेकिन बूथ लूट का पहला मामला बेगूसराय से ही जुड़ा रहा।
कहते हैं, बिहार में पहली बार बूथ लूटने की घटना पुराने मुंगेर और वर्तमान बेगूसराय के रामदीरी गाँव में हुई थी। वह भी साल 1957 में। तब रचियाही गांव के कछारी टोला में सरयुग प्रसाद सिंह के लिए बूथ कैप्चरिंग हुआ। वह देश के इतिहास में पहली घटना रही जब खुलेआम बूथ लूट ने राष्ट्रीय सुर्खियों में जगह बनाई। उस समय कम्युनिस्ट नेता चंद्रशेखर सिंह पुराने मुंगेर से निर्वाचित हुए थे।
बिहार की राजनीति में यह पहली घटना हुई जिसने चुनावी जीत के लिए बाहुबल का इस्तेमाल करना सिखाया।
जिस बेगूसराय में 1957 में बूथ लूट की पहली घटना हुई उसी बेगूसराय में हुए कामदेव सिंह। बिहार ने कई बाहुबली देखे, बिहार की राजनीति में कई बाहुबली हुए और हैं लेकिन बिहार में जो रुतबा कामदेव सिंह का रहा, वहां तक पहुंचना आज तक किसी तथाकथित बाहुबली के लिए संभव नहीं हुआ।
कामदेव सिंह को लेकर कई किस्से हैं कुछ मनगढं़त तो कुछ सच्ची। कहते हैं कि उस दौर में पुलिस महकमे में कामदेव सिंह की जलवा था। अगर नौबत आ जाए कि सरकार का कोई मंत्री और कामदेव सिंह दोनों किसी सरकारी दफ्तर में एक साथ प्रवेश करते तो अधिकारी पहले कामदेव सिंह को बैठने कहता। पता नहीं कितना सच है या झूठ लेकिन किस्से यूं ही नहीं निकलते। पहली तारीख को कामदेव सिंह का लिफाफा कई सर-सिपाही-मंत्री-संतरी तक पहुंच जाता वह भी उतना जितना उनका वेतन नहीं था। इसी कारण कामदेव सिंह के ट्रक नेपाल से चलकर कलकता तक बिना रोकटोक पहुंच जाते। दुनिया का हर प्रतिबंधित सामान उन ट्रकों में भरा रहता।
पटना से टाइम्स ऑफ इंडिया का संस्करण जब निकला तब पहली खबर ही कामदेव सिंह के इतिहास को खंगाल कर लिखी गई। कहते हैं ‘कामदेव सिंह’ के गोदाम के गेटकीपर के पास भी आज पटना में करोड़ों की धन संपदा है। वो खुद बेगूसराय के रोबिनहुड थे। हर साल अपने क्षेत्र में सैकड़ों गरीब बाप की बेटी की शादी का पूरा खर्च उठाते थे। क्या बेगूसराय, पटना हो या नेपाल से कलकता और मुंबई हर जगह कामदेव सिंह की उस समय चर्चा थी। हो भी क्यों न क्योंकि लोग कहते हैं कि इंदिरा गांधी का आशीर्वाद मिला था कामदेव सिंह को। जब इंदिरा गांधी बिहार आयीं, तब उन्होंने एक नंबर से लेकर सौ तक, सभी सफेद एंबेसेडर से उनका स्वागत किया था। भला जिसकी ऐसे हैसियत हो उसे कौन छू लेगा।
तो इस कामदेव सिंह को लेकर यह भी कहा गया कि उस दौर में जिस नेता को लगता था कि वह चुनाव हार जाएगा वह कामदेव सिंह से संपर्क करता और कामदेव की ऐसी माया चलती कि उस प्रत्याशी की जीत तय हो जाती।
इंडिया टुडे ने अपने एक लेख में लिखा था,
The man is Kamdeo Singh, his activities are centered in the Begusarai district of Bihar, and his hobby is to fight communists and ‘bless’ politicians during elections. “Even a rat can win the elections and enter legislature with his blessings but if anybody dare challenge him, his days are numbered,” say the people in Begusarai and police records confirm it.
लेकिन कहते हैं कि राजनीति किसी की सगी नहीं है। तो केंद्र में इंदिरा कमजोर हुई और राज्य में जगनाथ मिश्र अपना वर्चस्व स्थापित करने में लगे थे। इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ज्ञानी जेल सिंह का पटना आना हुआ। बिहार के पत्रकारों ने लिखा था ज्ञानी जेल सिंह ने अपनी तिरछी भौं कामदेव सिंह की तरफ की और मुख्यमंत्री डॉ जगनाथ मिश्र से भेंट के रूप में – कामदेव सिंह का मृत शरीर माँगा। डॉ जगनाथ मिश्र ने नजरें झुका अपनी हामी भरी… कल तक डॉ जगनाथ मिश्र का दाहिना हाथ अब राजनीति को भेंट चढने वाला था।
राजनीति की नजरें इनायत नहीं रह गई थी कामदेव सिंह पर। बाहुबल का जो वर्चस्व कामदेव सिंह ने कायम किया था वह किला अब भरभराने वाला था। लेकिन कामदेव सिंह को मारना भी इतना आसान नहीं था। जाति चरम पर थी और कामदेव को निपटाने के लिए उसकी जाति पर भरोसा करना सरकार चाह नहीं रही थी। अंत में डॉ जगनाथ मिश्र ने अपने ‘स्वजातीय’ राम चन्द्र खां को बेगूसराय भेजा और दो साल की घेराबंदी के बाद तीन तरफ से घिर चुके कामदेव सिंह जब गंगा में छलांग लगाने वाले थे तब उनकी पीठ में गोली मार दी गई। हाालांकि लहूलुहान कामदेव सिंह को पुलिस पकड़ नहीं पाई और वे गंगा में ही डूब गए।
उस दिन कामदेव सिंह की मौत के बाद सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों ने सिर्फ कामदेव सिंह को गाली नहीं दी बल्कि कामदेव की पूरी जाति को गरियाया गया था। उसकी पूरी जाति को गाली देकर कामदेव सिंह की मौत का जश्न मनाया जा रहा था। सत्ताधारियों ने वहीं से एक जाति को निशाना बनाकर अपनी राजनीति चमकानी शुरू की। लोग भले कहते हैं कि लालू ने जातिवादी राजनीति की शुरूआत की जबकि जाति की राजनीति के असली सूत्रधार तो जगनाथ मिश्र ही रहे।
कामदेव सिंह वह बाहुबली रहे जिसे मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक ने पाला भी और मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं हैं कि तर्ज पर कामदेव के बहाने उसकी पूरी जाति से बदला भी लिया।
कामदेव सिंह हीरो थे, और हीरो ही रह गये!!